शनिवार, 29 जुलाई 2017

२७०. सपने में मुलाक़ात

जब कभी हम मिले,
तुम्हारे साथ कोई था.

मैं अब तक नहीं समझा 
कि मुझमें ऐसा क्या है,
जो तुम्हें मुझसे अकेले में 
मिलने से रोकता है,
ऐसा क्या है मुझमें 
जो मुझसे तुम्हें डराता है.

चलो, अबकी बार मिलो,
तो सपने में मिलना,
अकेले में तुमसे मिलने की 
मेरी तमन्ना पूरी तो हो,
सपने में ही सही.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-07-2017) को "इंसान की सच्चाई" (चर्चा अंक 2682) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जाने कितने दृष्टिकोण से सोचता है इंसान
    बहुत अच्छी रचना

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  3. बहुत खूब ... सपने मं ही मिलो ... मिलो तो सही ...

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